जीवन दर्द का नाम है, मौत बस बदनाम है।
जीने की हर एक खवाइश से, दर्द कुछ और बढ़ जाता है।
जितना हम जीना चाहे, जीवन उतना और सताता है।
मानव जीवन जोकि अधिकतम 100 वर्ष के आसपास का होता है वो एक ऐसी विचित्र पहेली है जिसका आजतक कोई विद्वान उत्तर नहीं पा सका है। जीवन के आरंभ का एक हिस्सा तो अबोध स्थिति में ही गूजर जाता है जहां बाल मन सीखने और समझने की कोशिश करता है। फिर पढ़ाई, करिअर, काम-काज, शादी ब्याह और फिर बच्चे। फिर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, बूढ़े-माँ बाप की सेवा और फिर बुढ़ापा। एक-एक कर बड़े बुजुर्ग बिछड़ते चले जाते हैं। अंत में खुद की भी उम्र पूरी होने के कगार पर पँहुच जाती है। एक दिन मौत आ जाती है। अंत में हाथ कुछ नहीं लगता। सारी वासनाएँ, तृष्णाएँ, इच्छाएँ यहीं छूट जाते हैं। फिर हमारे बच्चे इस दुष्चक्र में फँसते हैं और फिर उनके बच्चे और इसी तरह पीढ़ी दर पीढ़ी ये कुचक्र चलता रहता है। इसका कोई अंत नहीं। शायद जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है।
नमस्ते!
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